:
Breaking News

Politics News: राहुल गांधी ने मनुस्मृति पर उठाए सवाल, बोले- महिला की पहचान किसी पुरुष रिश्ते से नहीं

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | पुणे में राहुल गांधी ने 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में मनुस्मृति का हवाला देते हुए महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और अधिकारों की बात की।

डेस्क, 23 अगस्त। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और अधिकारों को लेकर मनुस्मृति का मुद्दा उठाया। छात्राओं और युवाओं से संवाद के दौरान उन्होंने कहा कि किसी महिला की पहचान सिर्फ उसके पिता, पति या बेटे से तय नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक महिला का अपना अस्तित्व, अपने सपने और अपनी स्वतंत्र पहचान है।

राहुल गांधी ने मनुस्मृति के एक कथित प्रावधान का उल्लेख करते हुए उसमें महिला को जीवन के अलग-अलग चरणों में पुरुष रिश्तेदारों के अधीन रखने वाली सोच की आलोचना की। उन्होंने इसे शर्मनाक बताते हुए कहा कि महिलाओं को स्वतंत्र रूप से अपनी जिंदगी तय करने का अधिकार होना चाहिए।

पुणे में हुआ यह कार्यक्रम कांग्रेस के युवा संवाद अभियान ‘छात्रों की गूंज’ का हिस्सा था। इस दौरान राहुल गांधी ने केवल मनुस्मृति का मुद्दा नहीं उठाया, बल्कि महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, सामाजिक स्वतंत्रता और अपनी पहचान खुद तय करने जैसे सवालों पर भी बात की।

'महिला किसी की नहीं, खुद की है'

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में महिलाओं के पारिवारिक रिश्तों को नकारने की बात नहीं कही। उनका जोर इस बात पर रहा कि बेटी, पत्नी या मां होना महिला की पहचान का हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसकी पूरी पहचान सिर्फ इन्हीं रिश्तों तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि महिलाओं के पिता, भाई, पति और बेटे के साथ रिश्ते हो सकते हैं, लेकिन इससे यह तय नहीं होना चाहिए कि महिला का जीवन किस तरह चलेगा। उनके अनुसार महिला की अपनी इच्छा, अपनी सोच और अपने भविष्य को लेकर अपने फैसले होने चाहिए।

राहुल गांधी ने भारत की महिलाओं को देश की बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि देश में करोड़ों महिलाओं की अपनी अलग यात्रा, कल्पना और सपने हैं। उन्होंने युवतियों से खुद पर विश्वास करने और अपने लिए खड़े होने की अपील की।

'छात्रों की गूंज' में महिलाओं पर रहा खास फोकस

पुणे में आयोजित कार्यक्रम का मुख्य फोकस युवा महिलाओं और छात्राओं से संवाद पर रहा। कार्यक्रम में कई छात्राओं और युवतियों ने शिक्षा, परीक्षा, रोजगार, सामाजिक दबाव और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी उठाए।

एक छात्रा ने प्रतियोगी परीक्षा से जुड़े कथित पेपर लीक और परीक्षा दोबारा कराने की मांग का मुद्दा उठाया। वहीं एक आदिवासी छात्रा ने छात्रावास और अपनी समुदाय की छात्राओं से जुड़े सवाल सामने रखे। राहुल गांधी ने इन मुद्दों को सुनने और संबंधित छात्रों के साथ आगे बातचीत करने की बात कही।

इससे कार्यक्रम का स्वर केवल राजनीतिक भाषण तक सीमित नहीं रहा। राहुल गांधी ने युवाओं को अपनी समस्याएं सीधे सामने रखने का मौका भी दिया।

'पिंजरा तोड़ने' का संदेश

राहुल गांधी ने युवाओं से सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने की अपील की। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति की अपनी सोच, अपनी कल्पना और अपना भविष्य होता है। इसलिए किसी व्यक्ति को पहले से तय सामाजिक भूमिकाओं में बांधना उचित नहीं है।

महिलाओं के संदर्भ में उन्होंने खास तौर पर उस सोच की आलोचना की, जिसमें लड़की या महिला की स्वतंत्रता पर परिवार, समाज या पुरुष रिश्तों के आधार पर सीमाएं लगाई जाती हैं।

उन्होंने युवाओं से 'पिंजरा तोड़ने' की अपील करते हुए कहा कि लड़कियों को अपनी पसंद और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। कार्यक्रम में उन्होंने महिलाओं के खिलाफ पितृसत्तात्मक सोच को भी निशाना बनाया और इसे बदलने की जरूरत बताई।

बेटी, पत्नी और मां से आगे भी है पहचान

राहुल गांधी ने कहा कि महिला की पहचान को केवल बेटी, पत्नी या मां के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि महिलाएं पेशेवर, खिलाड़ी, उद्यमी, नेता और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय नागरिक भी हैं।

उनके अनुसार पारिवारिक संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी महिला की पूरी जिंदगी का मूल्यांकन सिर्फ इन्हीं रिश्तों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

यही बात उनके पूरे संबोधन का केंद्रीय संदेश रही—महिलाओं को अपने जीवन और भविष्य के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

बीजेपी और आरएसएस पर भी निशाना

राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्रता के सवाल को व्यापक राजनीतिक विचारधारा से भी जोड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में एक ऐसी मानसिकता मौजूद है जो महिलाओं को नियंत्रित करना चाहती है। उन्होंने इस संदर्भ में बीजेपी और आरएसएस पर भी निशाना साधा और कहा कि ऐसी सोच महिलाओं को सीमित करती है।

हालांकि, इस बयान को राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पिछले दिनों कांग्रेस और बीजेपी के बीच वंदे मातरम को लेकर विवाद तेज हुआ है। 21 अगस्त को राहुल गांधी के पुलिस थाने के बाहर प्रदर्शन को लेकर भी बीजेपी ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस इस मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है।

ऐसे में पुणे में मनुस्मृति और महिलाओं की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाना कांग्रेस और बीजेपी के बीच चल रही वैचारिक राजनीतिक बहस के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, राहुल गांधी के पुणे भाषण का प्रत्यक्ष केंद्र महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और अधिकार ही रहा।

मनुस्मृति का ऐतिहासिक विवाद

मनुस्मृति को लेकर भारत में लंबे समय से सामाजिक और वैचारिक बहस होती रही है। इसके सामाजिक नियमों और वर्ण व्यवस्था की आधुनिक समय में अलग-अलग सामाजिक सुधारकों और राजनीतिक विचारधाराओं द्वारा आलोचना की गई है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जातिगत असमानता के विरोध के अपने आंदोलन में मनुस्मृति के खिलाफ भी कड़ा रुख अपनाया था। 25 दिसंबर 1927 को महाड़ में मनुस्मृति दहन को सामाजिक समानता के आंदोलन के महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

हालांकि मनुस्मृति की आलोचना की परंपरा सिर्फ आंबेडकर तक सीमित नहीं रही। ज्योतिबा फुले सहित कई सामाजिक सुधार आंदोलनों ने जाति आधारित असमानता और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध किया था।

इसलिए राहुल गांधी के मौजूदा बयान को भारतीय सामाजिक सुधार और समानता की लंबी बहस के मौजूदा राजनीतिक संदर्भ से जोड़कर देखा जा रहा है।

महिलाओं की स्वतंत्रता को बनाया राजनीतिक मुद्दा

राहुल गांधी का पुणे भाषण महिलाओं की स्वतंत्र पहचान को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। उन्होंने महिला सशक्तीकरण को केवल आर्थिक या राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय से जोड़ा।

उन्होंने महिलाओं को अपने लिए आवाज उठाने, खुद पर भरोसा करने और समाज द्वारा बनाई गई सीमाओं को चुनौती देने का संदेश दिया।

कार्यक्रम में उन्होंने महिलाओं के खिलाफ हिंसा, अवसरों की कमी और आर्थिक निर्भरता जैसे मुद्दों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकने के लिए अलग-अलग प्रकार के दबाव काम करते हैं।

बयान से आगे बढ़ी राजनीतिक बहस

पुणे में राहुल गांधी के बयान के बाद मनुस्मृति एक बार फिर राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। कांग्रेस इसे महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता के सवाल से जोड़ रही है, जबकि बीजेपी और उसके नेताओं की ओर से राहुल गांधी के बयान को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आ रही है।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि भारत में महिलाओं की पहचान और स्वतंत्रता को किस नजरिए से देखा जाए। राहुल गांधी का तर्क है कि महिला को अपने पारिवारिक रिश्तों के साथ-साथ एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में भी स्वीकार किया जाना चाहिए।

उनका यह संदेश खास तौर पर युवा छात्राओं के बीच दिया गया, जिससे कार्यक्रम का सामाजिक और राजनीतिक दोनों महत्व बढ़ गया।

राहुल गांधी के पुणे कार्यक्रम की प्रमुख बातें

मनुस्मृति के एक प्रावधान का हवाला देकर महिलाओं की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया।

महिलाओं को पिता, पति या बेटे की पहचान तक सीमित करने वाली सोच की आलोचना की।

बेटी, पत्नी और मां के अलावा महिला की स्वतंत्र पहचान पर जोर दिया।

छात्राओं से सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने की अपील की।

युवाओं को 'पिंजरा तोड़ने' का संदेश दिया।

महिलाओं को भारत की बड़ी ताकत और संपत्ति बताया।

बीजेपी और आरएसएस की कथित पितृसत्तात्मक सोच पर निशाना साधा।

छात्राओं की परीक्षा, रोजगार और सामाजिक समस्याओं को भी सुना।

यह भी पढ़ें

राहुल गांधी का युवाओं से संवाद, छात्रों ने परीक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दे उठाए

वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस और बीजेपी में बढ़ी राजनीतिक तकरार, दोनों तरफ से बयानबाजी तेज

महिलाओं की पहचान पर बहस को नया राजनीतिक मंच

राहुल गांधी के पुणे भाषण ने महिलाओं की स्वतंत्र पहचान को फिर से राजनीतिक बहस का विषय बना दिया है। भारतीय समाज में महिला की भूमिका को लेकर परंपरा और आधुनिक सोच के बीच बहस लंबे समय से चली आ रही है।

परिवार महिला के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिला को अपने अधिकारों, शिक्षा, रोजगार और व्यक्तिगत फैसलों के मामले में स्वतंत्र नागरिक के रूप में देखना भी उतना ही जरूरी है।

राहुल गांधी ने इसी सवाल को मनुस्मृति के संदर्भ में उठाया। उनके बयान का राजनीतिक असर आने वाले दिनों में कितना दिखाई देता है, यह अलग विषय है, लेकिन पुणे में उन्होंने स्पष्ट रूप से महिलाओं की स्वतंत्र पहचान को अपने भाषण का केंद्रीय मुद्दा बनाया।

यह बहस केवल किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। भारत में महिलाओं की समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक सम्मान से जुड़े सवाल लगातार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक मंचों से इन मुद्दों पर होने वाली बहस का असर समाज और राजनीति दोनों पर पड़ना स्वाभाविक है।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *